बालोतरा: संयोग कभी-कभी इतना निर्मम भी हो सकता है कि जीवन भर उसका उत्तर नहीं मिलता।

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बालोतरा: चार भाई, जिनकी उम्र 25 से 33 वर्ष के बीच थी, जो सामान्यत कभी एक साथ यात्रा नहीं करते थे, उस दिन एक ही वाहन में सवार होकर काम के सिलसिले में घर से निकले। किसी ने नहीं सोचा था कि यह साथ उनका अंतिम साथ साबित होगा।रास्ते में हुई एक दुर्घटना ने समय को जैसे एक ही क्षण में थाम लिया। चारों भाइयों का जीवन एक साथ समाप्त हो गया। जिस आँगन में चार बेटों की आवाजें गूंजती थीं, वहाँ अब एक ऐसा सन्नाटा उतर आया है जिसे शब्दों में व्यक्त करना कठिन है।

माता-पिता के लिए यह केवल चार संतानों का वियोग नहीं, बल्कि अपने भविष्य, अपने संबल और अपनी आशाओं को एक साथ खो देने जैसा है। एक ही चिता पर नहीं, बल्कि एक ही दुख में चार-चार जीवनों की स्मृतियाँ समा गई हैं। कुछ घटनाएँ समाचार से आगे बढ़कर मानवीय संवेदना का विषय बन जाती हैं। यह भी ऐसी ही एक घटना है, जो हमें जीवन की अनिश्चितता और नियति की कठोरता के सामने निःशब्द खड़ा कर देती है

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