गांवों में टैक्स वसूली की नई तैयारी: हर परिवार से सालाना ₹1200 तक वसूली का लक्ष्य, नहीं पूरा हुआ तो बजट में कटौती

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राजस्थान सहित देशभर की ग्राम पंचायतों में अब विकास कार्यों के लिए केवल सरकारी अनुदान पर निर्भर रहने की व्यवस्था बदलने जा रही है। केंद्र सरकार के 16वें वित्त आयोग की सिफारिशों के तहत ग्राम पंचायतों को अपने स्तर पर टैक्स और यूजर चार्ज वसूलने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। नई व्यवस्था के अनुसार पंचायतों को स्थानीय स्तर पर राजस्व बढ़ाने के लिए ठोस कदम उठाने होंगे, अन्यथा उन्हें मिलने वाली परफॉर्मेंस ग्रांट में कटौती का सामना करना पड़ सकता है।

जानकारी के अनुसार राजस्थान की 14,403 ग्राम पंचायतों और लगभग 5 करोड़ ग्रामीण आबादी को इस नई व्यवस्था के दायरे में लाया जाएगा। पंचायतों को अपने क्षेत्र में रहने वाले परिवारों से सालाना कम से कम ₹1200 तक की राशि विभिन्न स्थानीय करों और शुल्कों के माध्यम से जुटाने का लक्ष्य दिया जा सकता है। यदि पंचायतें निर्धारित लक्ष्य हासिल नहीं कर पाती हैं तो उन्हें मिलने वाले अनुदान में 20 प्रतिशत तक कटौती की जा सकती है।

नई गाइडलाइन के तहत पंचायतों को स्थानीय संसाधनों से आय बढ़ाने के लिए कई विकल्प दिए गए हैं। इनमें गांवों में आवासीय और व्यावसायिक भवनों पर प्रकाश कर, सफाई कर, जल उपभोक्ता शुल्क, मेलों और हाट-बाजारों पर लगने वाले शुल्क तथा अन्य स्थानीय कर शामिल हैं। सरकार का मानना है कि पंचायतें यदि स्वयं राजस्व जुटाने में सक्षम बनती हैं तो विकास कार्यों के लिए उनकी आत्मनिर्भरता बढ़ेगी और स्थानीय स्तर पर बेहतर सुविधाएं उपलब्ध कराई जा सकेंगी।

हालांकि इस प्रस्ताव को लेकर ग्रामीण क्षेत्रों में चर्चा शुरू हो गई है। कई लोगों का मानना है कि पहले से महंगाई और आर्थिक चुनौतियों का सामना कर रहे ग्रामीण परिवारों पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ पड़ सकता है। वहीं कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि यदि पंचायतों द्वारा वसूले गए धन का उपयोग पारदर्शी तरीके से गांव के विकास, सड़क, पानी, सफाई और रोशनी जैसी सुविधाओं पर किया जाता है तो इससे ग्रामीण क्षेत्रों को लाभ भी मिल सकता है।

राज्य सरकार ने जिला परिषदों और पंचायत समितियों को इस संबंध में दिशा-निर्देश भेजने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। आने वाले समय में यह स्पष्ट होगा कि टैक्स वसूली की व्यवस्था किस प्रकार लागू होगी और ग्रामीण जनता पर इसका कितना प्रभाव पड़ेगा। फिलहाल यह विषय गांव-गांव में चर्चा का केंद्र बना हुआ है और लोग इसके नियमों तथा संभावित प्रभावों को समझने की कोशिश कर रहे हैं।

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