माॅंढ़ण: तस्वीर बुधवार रात 9:32 बजे की है। यह दृश्य है राजकीय सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (मॉडल हॉस्पिटल) माॅंढ़ण का, जहां की बत्तियां तो जल रही हैं, लेकिन मरीजों के इलाज के लिए न कोई डॉक्टर मौजूद है और न ही इमरजेंसी काउंटर पर कोई हलचल।
सरकारी दावों के अनुसार मॉडल सीएचसी में 24 घंटे आपातकालीन सेवाएं, प्रसव सुविधा और जीवन रक्षक उपचार मिलना अनिवार्य है। मगर जमीनी हकीकत यह है कि रात 8 बजते ही अस्पताल वीरान हो जाता है। यदि रात के समय किसी को दिल का दौरा पड़े, जहरीला जीव काट ले, गंभीर सड़क हादसा हो या किसी गर्भवती महिला को प्रसव पीड़ा उठे, तो उसे प्राथमिक उपचार तक नसीब नहीं होता।

अस्पताल परिसर में खाली पड़ा व्हीलचेयर और बंद पड़े कमरे सीधे-सीधे स्वास्थ्य विभाग की लचर कार्यशैली की गवाही दे रहे हैं। आपातकालीन स्थिति में तीमारदारों को मजबूरन मरीजों को बहरोड़, नीमराणा या निजी अस्पतालों में ले जाना पड़ता है, जिसमें कई बार देरी के चलते मरीज की जान जोखिम में पड़ जाती है।
जब अस्पताल को ‘मॉडल सीएचसी’ का दर्जा प्राप्त है, तो रात के समय इमरजेंसी सेवाएं किसके भरोसे बंद हैं?
क्या रात 8 बजे के बाद क्षेत्र के लोगों को बीमार पड़ने या दुर्घटनाग्रस्त होने की ‘मनाही’ है?
रात्रि ड्यूटी पर तैनात डॉक्टरों और नर्सिंग स्टाफ का आधिकारिक रोस्टर केवल कागजों तक ही सीमित क्यों है?
