तमिलनाडु में विजय की आंधी चली और द्रविड़ राजनीति के सूरमाओं का सफाया हो गया।

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चुनाव प्रचार के दौरान तमिलनाडु में तमाम मुद्दों के दौरान ये मुद्दा भी जोर पकड़ा था कि मेन स्ट्रीम की किसी भी पार्टी ने एक भी ब्राह्मण समुदाय से आने वाले शख्स को टिकट नहीं दिया. हालत ये रही कि तमिलनाडु ब्राह्मण एसोसिएशन (TAMBRAS) का समर्थन पाने में कामयाब रही बीजेपी ने भी एक भी ब्राह्मण को टिकट नहीं दी. ऐसी बात नहीं कि दूसरे राज्यों से यहां ब्राह्मणों की आबादी कम है. तमिलनाडु में भी ब्राह्मणों की आबादी 3-4 फीसदी के करीब बताई जाती है. जिन्हें आमतौर पर नायर के नाम से जाना जाता है. अब रिजल्ट सबके सामने है.

तमिलनाडु की राजनीति में लगभग 35 वर्षों बाद 2026 का विधानसभा चुनाव हुआ, जहां एक भी लीडिंग पार्टी ने ब्राह्मण को उम्मीदवार नहीं बनाया. राजनीतिक विश्लेषकों भी हैरान रह गए. राज्य की मुख्यधारा की पार्टियां DMK और AIADMK ने इस चुनाव में ब्राह्मण समुदाय से पूरी तरह दूरी बना ली. यहां तक कि हिंदुत्व की राजनीति करने वाली भाजपा ने भी अपने कोटे की 27 सीटों पर किसी ब्राह्मण को टिकट नहीं दिया. जबकि, AIADMK के संस्थापक एमजीआर और पूर्व मुख्यमंत्री जयललिता रहते ऐसा कभी नहीं हुआ था. जिस समुदाय की आबादी 3-4 फीसदी हो, उसे चुनावी राजनीति में नजरअंदाज कर देना भारी पड़ा. इससे उलट विजय की नई पार्टी टीवीके ने वोट कैलकुलेशन के हिसाब से ब्राह्मणों पर भरोसा दिखाया.

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